आदिवासी अंचल में सांप्रदायिकता की घुसपैठ
2002 के गुजरात जनसंहार की जाँच के दौरान ही हमें और बाकी देश को पता चला था कि किस तरह गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना कर, सांप्रदायिक राजनीति करने वाली ताक़तों ने हिंदू मुसलमानों के बीच पीढि़यों से बने कारोबार, मोहल्ले-पड़ोस, रोज़मर्रा के परस्पर सौहार्द्रपूर्ण संबंधों को खत्म किया। यही नहीं हिंदू जाति-व्यवस्था के पीड़ित दलित और हिंदू सामाजिक व्यवस्था के दायरे के बाहर मौजूद आदिवासी समाज के एक हिस्से को भी मुसलमानों के खि़लाफ़ गोलबंद किया गया। पंचमहल से लेकर अनेक ऐसे इलाकों में जहाँ आदिवासी बहुल आबादी थी, स्थानीय मुस्लिम आबादी के खि़लाफ़ उन्हें भड़काया गया, लालच भी दिया ही गया होगा और क़त्लेआम करने का काम आदिवासियों से करवाया गया। शहरी इलाकों में यही काम दलित समुदाय के लोगों का इस्तेमाल करते हुए करवाया गया। बाद में तमाम जाँच दलों की रिपोर्टमें यह खुलासे हुए। जब नरसंहार के दोषियों को पकड़े जाने की माँग देश-विदेश में उठी, तो इन्हीं दलितों- आदिवासियों को पकड़कर जेलों में ठूंस दिया गया। इस तरह सांप्रदायिकता फैलाने के मुख्य जिम्मेदार आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक अपराधी समाज में खुले तौर पर ...