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आदिवासी अंचल में सांप्रदायिकता की घुसपैठ

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2002 के गुजरात जनसंहार की जाँच के दौरान ही हमें और बाकी देश को पता चला था कि किस तरह गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना कर, सांप्रदायिक राजनीति करने वाली ताक़तों ने हिंदू मुसलमानों के बीच पीढि़यों से बने कारोबार, मोहल्ले-पड़ोस, रोज़मर्रा के परस्पर सौहार्द्रपूर्ण संबंधों को खत्म किया। यही नहीं हिंदू जाति-व्यवस्था के पीड़ित दलित और हिंदू सामाजिक व्यवस्था के दायरे के बाहर मौजूद आदिवासी समाज के एक हिस्से को भी मुसलमानों के खि़लाफ़ गोलबंद किया गया। पंचमहल से लेकर अनेक ऐसे इलाकों में जहाँ आदिवासी बहुल आबादी थी, स्थानीय मुस्लिम आबादी के खि़लाफ़ उन्हें भड़काया गया, लालच भी दिया ही गया होगा और क़त्लेआम करने का काम आदिवासियों से करवाया गया। शहरी इलाकों में यही काम दलित समुदाय के लोगों का इस्तेमाल करते हुए करवाया गया। बाद में तमाम जाँच दलों की रिपोर्टमें यह खुलासे हुए। जब नरसंहार के दोषियों को पकड़े जाने की माँग देश-विदेश में उठी, तो इन्हीं दलितों- आदिवासियों को पकड़कर जेलों में ठूंस दिया गया। इस तरह सांप्रदायिकता फैलाने के मुख्य जिम्मेदार आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक अपराधी समाज में खुले तौर पर ...

केवल इन लोगों को दीजिए नये साल की शुभकामनाएं, दुआएं देंगे ये लोग..!

नव वर्ष मुबारक हो उन्हें, जिन्हें नये कैलेण्डर की तारीखों में कुछ नयापन लगे। मैं तो 2015 के कट जाने की शुभकामनाएं देना और लेना चाहता हूं। ऐसा नहीं है की 2015 से मेरा कोई विशेष लगाव ह...

क्या आपको इस बात का एहसास है?

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यदि कोई इंसान अपनी ज़िंदगी से ख़ुश, संतुष्ट नहीं है और अकेलापन महसूस कर रहा है, तो ज़ाहिर है अपनी ज़िंदगी की ये कमी वो किसी और माध्यम से पूरी करने की कोशिश करता है। ये माध्यम कुछ भी हो सकता है। आज ई क्रांति के इस युग में इस माध्यम की भूमिका सोशल मीडिया निभा रहा है। कुछ लोग अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल दोनों ज़िंदगी की हर पल की अपडेट सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं और उस पर मिले कमेंट्स और लाइक्स से न ज़ाने उन्हें कौन-सी तृप्ति मिलती है? सोशल मीडिया अपने विचारों को मास तक पहुंचाने का एक अच्छा ज़रिया है, मगर वो विचार समाज और देश के हित में होने चाहिए। किसी की निजी ज़िंदगी के बारे में जानकर भला किसी को क्या मिलेगा। मगर लोगों को ये बात समझ नहीं आती। ख़ासकर लड़िकयां/महिलाएं वो हर दिन अपनी फोटो या यूं कहें कि उल-जूलूल सेल्फी भी सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं। कई बार तो सेल्फी का एंगल इतना बुरा होता है कि ख़ूबसूरत महिला भी डरावनी दिखने लगती है, मगर बावजूद इसके ऐसी सेल्फी को लोग ख़ूब लाइक करते हैं और अपनी सेल्फी पर मिली लाइक से महिला ऐसे ख़ुश होती है मानों उन्हें दीवाली का बोनस एडवांस में मिल गया हो। ज...

भारत के मूलनिवासी चूंकि जंगल की रक्षा करते थे इसलिए उन्हें रक्षक यानी राक्षस कहा गया !

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-आर्यों का मूल स्थान सेन्ट्रल एशिया में मुख्यत: सूमेरियन यूरेशियन थे।  -आर्य मुख्यत पशु पालन का काम करते थे  -आर्य जब भारतीय उप महाद्वीप में आये तो यहाँ घने जंगल थे  -आर्यों को गायों के लिए घास के मैदानों व स्थानीय आदिवासियों की ज़रूरत थी । जंगलों को नष्ट कर, मैदान तैयार करने के लिए आर्यों नें जंगलों को आग(दावानल) लगाना प्रारम्भ किया।  -आर्यों द्वारा की गयी दावानल को आर्यगण यज्ञ का नाम देते थे ।लेकिन भारतीय मूल निवासी जंगल पर आधारित जीवन जीते थे। इसलिए मूलनिवासी जंगल में लगी हुई आग को बुझा देते थे। इसीलिये आर्य कहते थे कि ये जंगलो के रक्षस हमारे यज्ञ में बाधा डालते हैं। भारत के मूल निवासी चूंकि जंगल की रक्षा करते थे इसलिए उन्हें रक्षक यानी राक्षस कहा गया। आर्यों के धर्मग्रंथों में राक्षसों का वर्णन ध्यान से पढ़िए: -उसमें लिखा गया है कि राक्षस काले रंग के होते थे। -राक्षसों के घुंघराले बाल होते थे। -राक्षसों के सींग होते थे। -राक्षसों का यह वर्णन यहाँ के मूल आदिवासियों का वर्णन है। -भारत के मूल निवासी सांवले/श्याम रंग के थे। -घुंघराले काले बा...

हम आदिवासी थे, आदिवासी है, ओर आदिवासी रहेगेँ...

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जिनके पास कटु सत्य से सामना करने का साहस है, ऐसे सभी सुधीजन आदर के साथ आमंत्रित हैं.. हमारी तहजीब को तुमने विज्ञापनों में उतारा हमारी नैसर्गिक परम्पराओं ने तुम्हारा मनोरंजन संवारा, हमारी संस्कृति, तुम्हारी शादी में नाचती-बजाती है हमारी जांगर तोड़ मेहनत तुम्हारे आलीशान घरों में कम मजदूरी पाती हैँ। हमारी कलाकृतियाँ, तुम्हारे ड्राइंग रूम की शोभा बनती हैं हमारी सेल्फी, अब तुम्हारे मेहमानों के लिए भी जमती है। हमारे लिए नमक भी तुम्हारी राजनीति का सौदा हो गयी आदिवासी होने का सर्टिफिकेट मुख्यमंत्री का ओहदा हो गयी... जंगली उत्पाद तुम्हारे इम्पोर्ट- एक्सपोर्ट के धंधे बन गए हमारी बदौलत न जाने कितनों के महल तन गए... हमारे अर्धनग्न आधे पहनावे तुम्हारी दर्शनीय वस्तु हो गयी ओ मनुवादी शहरी जीव! तुमसे मिलकर हमारी तो ओरिजिनलिटी खो गयी... हमारे पर्वतों, खदानों के लौह अयस्क तुम्हारे उद्योग बन गए हम भूखे रहे, हमारी जड़ी-बूटियाँ तुम्हारे उत्तम भोग बन गए, हमारी निःस्वार्थता और भोलेपन का कितना ओर दोहन करोगे ? क्या अब हमारी लंगोटी का भी चीर हरण करोगे ?? हमारी वेशभूषा पहनकर तुम्हारे नेता तस्वीरें खिंचवाते हैं...